खो खो | kho kho

[1] परिचय :


मैं बहुत सारे खेल खेलता हूं जैसे कि हॉकी, फुटबॉल, बैडमिंटन, क्रिकेट, लेकिन मुझे इन सब में सबसे ज्यादा खो खो (Kho Kho) खेलना पसंद है। खो खो और कबड्डी हमारे देश में परंपरागत रूप से पुराने जमाने से ही खेलें जाते रहे हैं। हमारे देश में खो खो खेल बहुत प्रसिद्ध और लोकप्रिय है। यह खेल खुले वातावरण और खुले मैदान में खेला जाता है। कहां जाता है कि खो-खो गरीबों का खेल है, क्योंकि इसको खेलने के लिए हमें पैसों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसलिए हमारे देश के गांवों में रहने वाले बच्चे इस खेल को खेलना बहुत पसंद करते हैं।

जिस प्रकार हमारे शरीर में ताकत बनाने के लिए भोजन की जरूरत होती है। उसी तरह से शरीर को स्वस्थ रखने के लिए खेल की आवश्यकता होती है। जिसके लिए खो खो खेल बहुत ही अच्छा खेल है। खो खो खेल के द्वारा आप अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। यह खेल भारत में प्राचीन काल से ही खेला जाता रहा है। इस खेल की उत्पत्ति भारत से ही हुई है। भारत में खो खो का जन्म स्थान बड़ौदा को माना जाता है।

Kho Kho
खो खो | kho kho

खो खो खेल को खेलते समय चोट लगने का खतरा बहुत कम होता है। क्योंकि यह खुले और मिट्टी के मैदान में खेला जाता है, जिसमें गिरने पर भी चोट नहीं लगती है। खो-खो खेल में हर एक टीम में 9 खिलाड़ी होते हैं। इस खेल को खेलने वाले धावक में स्फूर्ति का होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि इस खेल में मुख्यत: दौड़ ही लगाई जाती है। खो खो खेलने से हमारे हाथ और पैर की मांसपेशियां मजबूत होती है। इस खेल को खेलने से हमारी सोचने समझने की शक्ति बढ़ती है।

खो खो खेल को खेलने के लिए एक मैदान में एक निश्चित दूरी पर दो खंभे लगा दिए जाते हैं, और उनके बीच दोनों टीमों के धावक एक दूसरे के विरुद्ध दिशा में बिठा दिया जाते है। और सीटी बजते ही एक टीम का खिलाड़ी दूसरी टीम के खिलाड़ी को पकड़ने लग जाता है। और अगर वह खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को पकड़ लेता है तो दूसरी टीम का धावक खेल से आउट हो जाता है।

खो खो खेल को शांतिपूर्वक खेला जाता है और इसे खेलने से आपस में भाईचारा भी बढ़ता है। और साथ ही हमारे पूरे शरीर का एक साथ विकास होता है। खो खो का खेल भारतीय स्कूलों में बहुत ही ज्यादा खेला जाता है। यह खेल बच्चों का पसंदीदा खेल है। बच्चों को यह खेल बहुत अच्छा लगता है। खो खो खेल को खेलना बहुत ही आसान है। इस खेल को खेलने से आपको किसी भी तरह की चोट लगने का भी खतरा नहीं होता है। खो खो खेल को खेलने के लिए किसी भी तरह के साधन की जरूरत नहीं होती है। यह खेल मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में बहुत लोकप्रिय है।

[2] खो खो का इतिहास :


खो खो शब्द की उत्पत्ति महाराष्ट्र राज्य से हुई है। यह मुख्य रूप से एक भारतीय खेल है। इस खेल की शुरुआत "पूना" (महाराष्ट्र) में हुई थी। इस खेल का वर्णन धर्मशास्त्र में है। जिसमें लिखा हुआ था कि श्री कृष्ण इस प्रकार का खेल अपने मित्रों के साथ खेलते थे। खो शब्द संस्कृत के "श्यू" से लिया गया है, जिसका अर्थ "खड़े हो और जाओ" है।

Some children are playing kho kho.
खो खो | kho kho

जब भी हम तेज खेलों की बात करते हैं, तो खो खो का खेल ही हमारे दिमाग में आता है। जो कि एक साधारण सा खेल है। यह खेल बिना किसी उपकरण के खेला जाता है। जिससे ना केवल एक स्वस्थ शरीर बल्कि स्वस्थ मस्तिष्क का विकास होता है। महाराष्ट्र में यह खेल बहुत लोकप्रिय है। इस खेल की लोकप्रियता और विकास का संबंध महाराष्ट्र राज्य से है। बड़ौदा के "हनुमान व्यायाम प्रचारक मंडल" (HYPM) ने खो खो खेल का आधुनिक स्वरूप दिया। खो-खो के सामान्य नियमों की स्थापना अखिल महाराष्ट्र शारीरिक शिक्षा मंडल और पुणे के जिमखाना क्लब द्वारा की गई थी।

"अखिल महाराष्ट्र शारीरिक शिक्षा मंडल" जो कि सन् 1928 में बना था ने इस खेल को विकसित करने में पूरा योगदान दिया। सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में खो खो की एक टीम पूना से प्रदर्शन करने के लिए गई थी। "खो खो फेडरेशन ऑफ इंडिया" (K.K.F.I.) की स्थापना सन् 1955 में हुई थी। K.K.F.I. को राष्ट्रीय स्तर की पात्रता "इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन" के द्वारा दी गई थी। भारत में खो खो खेल की राष्ट्रीय चैंपियनशिप सन् 1960 में विजयवाड़ा में आयोजित की गई और महिलाओं की राष्ट्रीय चैंपियनशिप सन् 1961 में कोल्हापुर में आयोजित की गई। खो खो का खेल भारत, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान आदि देशों में खेला जाता है।

"Asian Kho Kho Federation" (A.K.K.F.) की स्थापना सन् 1987 में कोलकाता में कि गई थी। पहली एशियन खो खो चैम्पियनशिप, 1996 में कोलकाता में खेली गई थी। जिसमें पांच देशों ने भाग लिया भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्री लंका और नेपाल। दूसरी एशियन खो खो चैम्पियनशिप ढाका में आयोजित कि गई। जिसमें उपरोक्त पांच देशों के अलावा थाइलैंड और जापान ने भी हिस्सा लिया था।

[3] खो खो का मैदान और नियम :


खो खो खेल को खेलने के लिए 111 फुट लंबे और 51 फुट चौड़े मैदान की जरूरत होती है। साथ ही इसी मैदान में 10-10 फुट का स्थान छोड़कर 4-4 फुट लंबे लकड़ी के दो खंभे गाड़े जाते हैं। और खंभों की बीच की दूरी को 8 बराबर भागों में बांट दिया जाता है। खो खो खेलने के लिए मिट्टी का मैदान ही उचित होता है, जिससे किसी भी खिलाड़ी को चोट नहीं लगती है।

A group of people are playing Kho Kho.
खो खो | kho kho

खो खो का खेल दो टीमों के बीच खेला जाता है। दोनों टीमों में से 9-9 खिलाड़ी इस खेल में भाग लेते हैं। यह बहुत ही रोमांचक और आनंदमय खेल होता है। जिसे खेलने वाले सभी लोग बिना किसी आपसी मतभेद के इस खेल को उत्साह के साथ खेलते हैं।

खो खो खेल ने बहुत सारे अर्जुन अवार्ड जीतने वाले खिलाड़ी दिए हैं। जिन्होंने विश्व भर में भारत का डंका बजाया है। प्रो कबड्डी लीग की सफलता के बाद अब खो खो के लिए भी लीग शुरू करने की तैयारी की जा रही है। जिससे खो-खो खिलाड़ियों को और अधिक प्रोत्साहन मिलेगा।

(1) नियम :

चूंकि यह खेल दो टीमों के बीच खुले मैदान में खेला जाता है। जिसमें प्रत्येक टीम में 9 खिलाड़ी भाग लेते हैं। एक मैच में चार चरण होते हैं अर्थात पारियां होती है। जिसमें प्रत्येक पारी में कुछ मिनट का समय होता है। प्रत्येक टीम दो पारियों में धावक का रोल निभाती है, और दो पारियों में चेज़र का। प्रारंभ में केवल 3 खिलाड़ी ही सीमा के अंदर होते हैं। जब यह 3 खिलाड़ी आउट हो जाते हैं, तब दूसरे तीन खिलाड़ी मैदान के अंदर आते हैं, और खेलते हैं। चेज़र टीम का एक खिलाड़ी धावक को पकड़ने के लिए खड़ा होता है, और वही बाकी आठ खिलाड़ी 30/30 सेंटीमीटर वर्ग में बैठे होते हैं।

दौड़ने वाला खिलाड़ी बैठे हुए खिलाड़ियों में से एक को खो देता है। खो देने के बाद जिस खिलाड़ी को खो दिया जाता है, वह खिलाड़ी तुरंत उठकर धावक को पकड़ने के लिए दौड़ता है। और उसका स्थान पहले वाला खिलाड़ी ले लेता है। इस प्रक्रिया के दौरान अगर चेज़र टीम का खिलाड़ी धावक टीम के दौड़ने वाले खिलाड़ी से स्पर्श हो जाता है। तो चेज़र टीम को अंक प्राप्त हो जाएगा। इस प्रकार जो टीम अधिक अंक प्राप्त करती है, वह टीम जीत जाती है।

(2) निर्णायक :

खो खो के खेल में एक रेफरी, एक टाइम कीपर, एक स्कोरर और दो अम्पायर होते हैं। यह सब खेल पर नज़र रखते हैं। और देखते हैं कि खेल में किसी तरह की कोई बेईमानी न हो। साथ ही यह खेल के दौरान उचित निर्णय लेने का कार्य भी करते हैं।

[4] खो खो खेलने का तरीका :


खो खो खेल में हर टीम में 9 खिलाड़ी होते हैं, इस खेल को खेलने के लिए खिलाड़ी को अपने दिमाग के साथ-साथ शरीर की फुर्ती का भी इस्तेमाल करना पड़ता है। साथ ही इस खेल को खेलने के लिए तेजी और फुर्ती की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता होती है। और इस खेल को लड़के और लड़कियां दोनों ही खेल सकते हैं।

इस खेल में दोनों टीमों के खिलाड़ियों को दोनों खंभों के बीच की रेखा पर एक-दूसरे के विपरीत अलग-अलग दिशाओं में बैठा दिया जाता है। जब सभी खिलाड़ी अपने-अपने स्थान पर सही तरीके से व्यवस्थित हो जाते है, तो एक सिटी बजाई जाती है सिटी बजते ही खेल शुरू हो जाता है। खेल शुरू होते ही एक टीम का खिलाड़ी दूसरी टीम के खिलाड़ी को पकड़ने के लिए दौड़ जाता है। दोनों टीमों के खिलाड़ी खंभों के चक्कर लगाते हैं और अपने विरोधी खिलाड़ी को छूने की कोशिश करते हैं। अगर दूसरी टीम का खिलाड़ी अपने ही खिलाड़ी के सामने होता है तो हमारी टीम का खिलाड़ी अपने ही खिलाड़ी की पीठ को छूकर खो बोलता है।

जो खिलाड़ी खो बोलता है, वह खिलाड़ी अपनी जगह उस खिलाड़ी को दौड़ने के लिए भेज देता है। और खुद उस स्थान पर बैठ जाता है, अगर एक टीम का खिलाड़ी दूसरे टीम के खिलाड़ी को पकड़ लेता है या छू लेता है। तो विरोधी टीम का खिलाड़ी खेल से आउट हो जाता है।

इसी प्रकार यह खो खो का खेल खेला जाता  है, और जो टीम अपनी विरोधी टीम को सबसे पहले आउट कर देती है। वह टीम इस खेल को जीत जाती है।

[5] खो खो प्रतियोगिता :


Some players are playing Kho Kho in the field.
खो खो | kho kho

खो खो का खेल भारत के परंपरागत खेलों में से एक है। जिसे अब धीरे-धीरे अपनी पहचान मिल रही है। इस खेल ने बहुत अच्छे-अच्छे खिलाड़ी हमारे देश को दिए हैं। जिन्होंने देश का नाम विश्व में रोशन किया है। अब यह खेल दूसरे देशों में भी खेला जाने लगा है, और दूसरे देशों के लोग भी अब इस खेल में भाग ले रहे हैं। इस तरह खो खो का खेल आज एक अच्छे मुकाम पर है। अब खो खो के खेल से संबंधित विभिन्न प्रकार की प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जा रहा है। जिसमें सभी छात्र छात्राएं भाग ले रहे हैं। भारत हर साल खेलो इंडिया का आयोजन करता है, जिससे खो-खो को बहुत वरीयता मिलती है। सभी इसमें बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।

खो खो की सबसे पहली प्रतियोगिता सन् 1918 में पूना के जिम खाने में हुई थी। और फिर सन् 1919 में राष्ट्रीय स्तर पर बड़ौदा में खो खो की प्रतियोगिता हुई थी। इसके बाद से कई जगहों पर खो खो की प्रतियोगिता लगातार होती रही और आज भी खो खो की विभिन्न प्रतियोगिताएं होती रहती हैं।

सबसे ज्यादा भारतीय स्कूल में खो खो की प्रतियोगिताएं होती रहती है। जिनमें बच्चे बहुत उत्साह से भाग लेते हैं, और उन्हें इस खेल को खेलने में बहुत आनंद आता है। क्योंकि पढ़ाई के साथ-साथ खेल बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है। इसीलिए स्कूलों में भी समय-समय पर खो खो प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।

खो खो के खेल का सभी विद्यालयों में जिला स्तर पर, राज्य स्तर पर आयोजन करवा कर इस में भाग लेने वाले विद्यार्थियों को प्रमाण पत्र और प्रोत्साहन राशि देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। ताकि वे आगे चलकर खो- खो के प्रसिद्ध खिलाड़ियों की तरह बन सके और भारत का नाम रोशन कर सकें। भारत में आयोजित होने वाली "खेलो इंडिया" ने भी खो खो खेल के विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस खेल को टीवी पर देखने से, या इस खेल के बारे में सुनने से अब ज्यादा से ज्यादा लोग इस खेल में अपनी रुचि दिखा रहे हैं; और उस में भाग ले रहे हैं।

[6] खो खो खेल के फायदे :


उपरोक्त कारणों के कारण हम सभी के जीवन में खेल का बड़ा महत्व है। खेल हमें शारीरिक रूप से तो तंदुरुस्ती देता है, साथ-साथ यह मानसिक विकास के लिए भी काफी आवश्यक है। यह शरीर को फुर्तीला और स्वस्थ बनाए रखता है। खो खो का खेल एकाग्रता बनाए रखने के लिए भी काफी जरूरी है। जीवन में अगर हमें कहीं पर भी आगे बढ़ना है। तो एकाग्रता की बहुत आवश्यकता होती है। एकाग्रता पढ़ाई में हो या चाहे वह किसी भी फील्ड में हो एकाग्रता इंसान के लिए बहुत जरूरी है। इस लिए सभी को अपने जीवन में किसी ना किसी रूप में खेल को अपनाना चाहिए। और खो-खो जैसे खेलों में अपना योगदान देना चाहिए।

[7] निष्कर्ष :


इस संसार में कई प्रकार के खेलों को खेला जाता हैं, लेकिन मुझे सबसे अच्छा खेल खो खो लगता है। खो खो खेल को खेलना मुझे बहुत पसंद है। मैं और मेरे सभी दोस्त स्कूल के ब्रेक टाइम में रोज़ाना इस खेल को खेलते हैं। मैं खो खो को शाम को भी अपने दोस्तों के साथ खेलता हूँ। इस खेल को खेलने से हम सभी को बहुत आनंद आता है। खो खो का खेल भारतवर्ष में बहुत प्राचीन समय से खेला जा रहा है। इस खेल का आविष्कार भारत के पुणे शहर में हुआ था। आज के समय में यह खेल भारत के हर शहर में बहुत तेजी से प्रसिद्ध हो रहा है।

खो खो खेल को खेलना बहुत ही आसान है, और इसे खेलने में किसी तरह का कोई खतरा भी नहीं है। खो खो खेल को खेलने के लिए शरीर में तेजी और फुर्ती का होना बहुत ही जरूरी है। महिला एवं पुरुष दोनों इस खेल को सरलता से खेल सकते हैं। इस खेल को खेलने के लिए मिट्टी का मैदान बहुत अच्छा होता है।

खो खो खेल को खेलने के लिए कुछ नियम बनाये गए हैं, जैसे खेल में दो टीम होती हैं और हर टीम में 9 खिलाड़ी और 3 अतिरिक्त खिलाड़ी होते हैं। खो खो खेल को खेलने के लिए एक मैदान की जरूरत होती है, मैदान में 10-10 फुट की जगह छोड़कर 4-4 फुट ऊंचे लकड़ी के खंभे, दोनों तरफ लगाए जाते हैं। खंभों के बीचोबीच एक रेखा खींची जाती है, जिसमें दोनों टीम के खिलाड़ियों को एक दूसरे के विपरीत दिशा में बैठा दिया जाता है। खेल को शुरू करने के लिए जैसे ही सीटी बजती है, एक टीम का खिलाड़ी विरोधी टीम के खिलाड़ी को पकड़ने में लग जाता है। अगर वह खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी को दौड़कर पकड़ लेता है, तो दूसरी टीम का खिलाड़ी उस खेल से बाहर हो जाता है।

खो खो (kho kho) खेल को खेलने से बहुत लाभ होते हैं। इस खेल को खेलने से दिमाग की सोचने समझने की क्षमता बढ़ती है, जिससे कि आप किसी भी निर्णय को तुरंत लेने में सक्षम हो जाते हैं। और इससे आपके भौतिक शरीर को भी बहुत फायदा होता है। आपको किसी भी प्रकार कि बीमारियां नहीं होती हैं और आप एक स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। इसलिए हमें अपनी पढ़ाई और काम के साथ-साथ खेल खेलना चाहिए क्योंकि जब हमारा दिमाग और शरीर स्वस्थ रहेगा तब हम काम और पढ़ाई अच्छी तरह से ध्यान लगाकर कर सकेंगे।

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